मैंने एक असमंजस हटाने के लिए अपने आपको पीछे कर लिया :- हरीश रावत

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हरीश रावत लगातार सोशल मीडिया ऐसे बयान दे रहे हैं जिसमें कहीं ना कहीं कांग्रेस को अब यह सोचने की जरूरत है कि उत्तराखंड में भाजपा से राजनीतिक जंग लड़ने के लिए एक ऐसे स्थानीय चेहरे की जरूरत है जो फिर से कांग्रेस को 2022 में सत्ता की वापसी कर सकें। लेकिन कांग्रेस में गुटबाजी के चलते बजाए भाजपा से राजनीतिक युद्ध करने के कॉन्ग्रेस आपसी युद्ध में उलझ गई है कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लगातार इस बात को समझा रहे हैं कि अब समय आ चुका है और कांग्रेस किसी एक चेहरे को लेकर 2021 से 2022 तक के चुनावी जंग लड़े लेकिन कॉन्ग्रेस में अहम और वर्चस्व की लड़ाई में इस वक्त कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और उत्तराखंड की जनता को अधर में फंसा दिया है

हरीश रावत लगातार एक ऐसी मांग कर रहे हैं जो कांग्रेस को 2022 में सत्ता में वापसी करवा सकती है लेकिन जिस तरीके से पार्टी के अंदर ही हरीश रावत के बयानों को तोड़ मरोड़ कर और दूसरे ढंग से देश कर जवाबी हमले हो रहे हैं उसे कांग्रेस लगातार कमजोर पड़ती जा रही है

इस बार हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर काफी लंबा अपना बयान दिया है जिसमें यह समझाया है कि वह मुख्यमंत्री के पद के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस को दोबारा सत्ता में वापसी के लिए बात कर रहे हैं

2017 की #चुनावी हार का मुद्दा भी बार-बार उभर करके मुझे डराने के लिये खड़ा हो जाता है। मैं, 2017 की चुनावी हार का सारा दायित्व ले चुका हूँ। मैंने, #पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर और आपस में इस बात को लेकर विवाद, हमें और कमजोर न करे इसलिये अपने ऊपर #दायित्व लिया। मैंने कोई बहाना नहीं बनाया जबकि बहाने बहुत बनाये जा सकते थे, मगर एक तथ्य हम सबको समझना चाहिये कि हमें 2017 की हार से #लिपटे नहीं रहना है, उससे ऊपर उठना है और 2017 की हार के समसम्यक #चुनावों के परिणामों को भी अपने सामने रखना है। उत्तर प्रदेश में हमारा #महागठबंधन था, मगर उत्तर प्रदेश की धरती में जाति और सामाजिक समीकरण ध्वस्त हो गये और श्मशानघाट व कब्रिस्तान के नारे ने मानस बदल दिया। उस समय के भाजपा के प्रचारक योगी आदित्यनाथ ने #उत्तराखंड में आकर जिस तरीके से चुनावों को पोलोराइज किया तो हिंदू, उसमें भी उच्च वर्णीय हिंदुओं के बाहुल्य वाले राज्य में उन सबका प्रभाव पड़ा। मैं आभारी हूं उत्तराखंड की जनता का कि इतने सघन धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशों के बावजूद भी हमारे कांग्रेस के वोटों का प्रतिशत नहीं गिरा। आप 2012 के #विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को प्राप्त वोटों का प्रतिशत देख लीजिये, यहां तक की वोटों में जो वृद्धि हुई, उस वृद्धि को देखते हुये प्रतिशत में तो हम 2012 में कांग्रेस को पड़े वोटों के बराबर रहे और वोटों में जो वृद्धि हुई, उसके अनुसार हमारे #वोटों में कुल वोटों की संख्या में 2012 की तुलना में करीब पौने दो लाख की वृद्धि हुई। कितना अथक परिश्रम किया होगा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने, एक बड़ी टूट और विशेष तौर पर ठीक #चुनाव के वक्त में एक पूर्व कांग्रेस #अध्यक्ष का चला जाना, कोई सामान्य बात नहीं थी। मगर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम से कांग्रेस अपने 2012 के जिस समय हम जीते थे, उस वोट बैंक को कायम रखने में सक्षम रहे। करीब 12 सीटें ऐसी हैं, जिनमें हमारी हार का मार्जन बहुत कम है, यहां तक की #सल्ट में अन्तिम क्षणों में हमने श्रीमती गंगा पंचोली जी को टिकट दिया, तो वहां भी हम 2900 वोटों से पीछे रहे, मतलब 1500 वोट और यदि गंगा पंचोली को मिल जाते तो वो विधानसभा की सदस्य होती तो ये जो #अंकगणित है, यह हमको शक्ति देता है। 2022 की रणनीति बनाने के लिये, हमें 4-5 प्रतिशत और वोट अपने बढ़ाने हैं, वो बढ़ोतरी बसपा, यूकेडी और दूसरे दलों के जो वोट समूचे तौर पर #भाजपा को स्थानांतरित हो गये थे, उनको कैसे हम अपने पास ला सकें। मैंने इसी रणनीतिक आवश्यकता को लेकर के स्थानीय बनाम स्थानीय नेतृत्व, ताकि चुनावी परिदृश्य में भाजपा #मोदी जी को लाने का प्रयास करें तो मोदी जी के बजाय स्थानीय मुद्दे और स्थानीय नेताओं के चेहरों पर चुनाव हो, इसीलिये मैंने 2022 के चुनाव के लिये #मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की बात कही, एक सुझाव दिया। लोकतांत्रिक पार्टी में चर्चाएं होती हैं और मैंने एक असमंजस हटाने के लिए अपने आपको पीछे कर लिया ताकि लोगों को यह न लगे कि #हरीश_रावत केवल अपने लिए इस बात को कह रहा है तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं, जब मैंने उस दावेदारी से, उस चाहत से अपने को हटा लिया तो फिर यह #दनादन क्यों?


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